खानाबदोश क्या है? खानाबदोश पशुपालन व्यवस्था | IGNOU MA HISTORY NOTES

अपने आसपास देखा होगा कि आज के समय में जो भी लोग हैं, वह शहर गांव कस्बे या फिर इलाकों में रहते हैं। जहां पर घनी आबादी में लोग निवास करते हैं। पर क्या ऐसा आरंभिक समय में भी हुआ करता था? यह हम प्रश्न अक्सर अपने मन में पूछते हैं व सोचते हैं। पर ऐसा बिल्कुल नहीं था। उस वक्त लोग अलग-अलग समुदाय में रहा करते थे, जिसमें से एक समुदाय का नाम था खानाबदोश। आज खानाबदोश के बारे में विस्तार में समझेंगे?

घुमंतू जाति –

खानाबदोश, उन समुदाय को कहा जाता था जो एक जगह स्थिर रह कर नहीं रहते थे। तात्पर्य एक स्थान पर नहीं रहते थे ।जो खानाबदोश समुदाय था वह मौसम के अनुसार जरूरत के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमता रहता था। इस कारण इस समुदाय को घुमंतू जाति भी कहते हैं।

खानाबदोश सामान्य परिचय –

सामान्य शब्दों में कहें तो अपने स्थान को बार-बार बदलते रहना, खानाबदोश कहलाता है। तात्पर्य यह है कि कोई भी समुदाय एक जगह पर स्थिर हो कर नहीं रहता तो वह खानाबदोश कहलाता हैं।  उनके समुदाय में सामान्य तौर पर  10 से 20 लोगों का समुदाय हुआ करता है।

इतना बड़ा समुदाय होता क्यों था। मान लो खानाबदोश कहीं पर पर गए हैं। वहां पर किस तरह का खतरा है। किस तरह की जरूरतें हैं। कितने लोगों की जरूरत पड़ेगी। इसके कारण पूरा समूह, जिसमें 20, 50, 100 लोग रहा करते थे, एक साथ एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे।

अगर हम सामान्यतौर पर बात करें तो खानाबदोश कबीले और जातियों को अपना क्षेत्र होता था जिसमें आवश्यकतानुसार घूमते फिरते रहते थे। ऐसा नहीं था कि घूमते घूमते आज यहां है तो कल दूसरे जगह पहुंच गए। उनकी एक सीमा होती था कि इतनी बड़ी जगह है तो इसमें ही आज यहां पर है तो कल यहां पर। इतनी बड़ी जगह तात्पर्य यह नहीं कि एक छोटा सा इलाका।
उदाहरण के तौर पर

जैसे मान लो – दिल्ली पूरा इतना बड़ा है। घुमंतू जाति नॉर्थ दिल्ली से आता है। वह घूमते घूमते साउथ दिल्ली जा सकता है। बेस्ट दिल्ली जा सकता है। सेंट्रल दिल्ली आ सकता है। इस तरीके की संभावना हो सकती है। पर यह नहीं कि आप दिल्ली से निकलकर अमेरिका चला गया। ऐसा नहीं होगा। तात्पर्य अपने इलाके में ही इधर से उधर घूमता रहेगा। एक निश्चित इलाका होता है।

खानाबदोश किन कारणों से इधर उधर धूमते है –

आम तौर पर स्थान, मौसम परिवर्तन और खाद्य उपलब्धि पर निर्भर करता है। स्थान परिवर्तन से क्या तात्पर्य है? स्थान पर मौजद खाने-पीने का जो समान होते हैं। वह उनके अनुकूल हे के नही इस बात पर बहूत अधिक निर्भर करता है।

खानाबदोश पशुपालन व्यवस्था –

सामान्य तौर पर ऊँट, खच्चर, घोड़ा, गाय, बैल या भैंस को अपने पालतू बनाकर घूमते हैं। इनको पालतू बनाने में आसानी यह भी है कि इनको किसी अलग तरह की चीजों की मांग नहीं होती है।

उदाहरण के तौर पर

अगर मान लो हाथी को पालतू बनाता है तो इन को पालतू बनाने में रोज काफी साऱा भोजन कहां से लाएगा।  ऊँट, खच्चर, घोड़ा, गाय, बैल या भैसें सामान्य और कम चीजे खा सकते है। आसपास में जो वातावरण उससे वह खा पीकर अपना पेट भर सकते हैं और इनका वह जरूरत के अनुसार उपयोग भी करते हैं। चाहे वह गाड़ी के लिए उपयोग करें। अलग-अलग तरीके से उपयोग भी करते हैं।

मौसम – विशेष कारण

मौसम के अनुसार वह एक जगह टिकता नहीं है। जैसे ही मौसम बदला तो वह एक जगह से दूसरी जगह चले जाते हैं। इनका जीवन सब प्रकार के मौसम परिवर्तन के अनुकूल हो जाता है। पूरी तरह से जो स्थान परिवर्तन होता है, मौसम के अनुसार होता है कि जैसे जैसे मौसम बदलता है, वैसे वैसे यह भी अपना स्थान बदलते हैं।

पशु का स्थान –

पशु इनका मुख्य धर्म के तौर पर देखा जाता है।  इनके लिए पशु सबसे महत्वपूर्ण चीज है क्योंकि वह पशु के जरिए ही अपना जीवन यापन करते हैं। पशु के आधार ही खाना पीना सब कुछ। इनके घर में, तात्पर्य समुदाय, में पुरुषों को पशु की देखभाल करने के लिए रखा जाता है। इन समुदाय में भी  काम विभाजित होता है। औरतें  घर संभालने का काम करती हैं, अपने आसपास के इलाकों को बनाने का काम करती हैं इत्यादि जैसे सारी चीजें करती हैं।

महिलाओं का स्थान –

ऐसे समुदाय में स्त्रियों को न्यून स्थान दिया जाता है। तात्पर्य इनको बराबरी का हक नहीं दिया जाता था। जाति पिछड़ी जातियों के तौर पर देखी जाती हैं।

भारत में खानाबदोश –

आज भी हमारे भारत में बहुत ज्यादा तौर पर, तात्पर्य आप जाकर पिछड़े इलाकों में जाते हो, तो वहां पर खानाबदोश संस्कृति आपको देखने के लिए मिलेगी। प्रणाली देखने को मिलेगी कि आज भी कई सारे समुदाय जो खानाबदोश की जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं।

खानाबदोश – जनतांत्रिक

शिकारी खानाबदोश की भांति इनका जो राजनीतिक जीवन जनतांत्रिक होता है, इनके समुदाय में बड़े बूढ़ों की विशेष मान्यताएं होती है। इनके समुदाय में यहां पर गणतंत्र की बात करता है तो तात्पर्य क्या होता है कि जो लोग होते हैं उनके समुदाय में एक बड़ा बुजुर्ग होगा। पूरे समुदाय को वही लीड करता है। वहीं का हेड बन जाता है और हेड बनने के बाद वहीं निश्चय करता है कि किस समुदाय को कहां पर जाना है, कैसे रहना है,  । कौन सा जगह सही रहेगा, सुरक्षित रहेगा। वह एक तरह से लीडर का भूमिका निभाता है।

भारत के अंदर मुख्य खानाबदोश जनजातियां –

भारत के अंदर में भी कुछ समुदाय हैं जो घूमतू कहलाते हैं। या बंजारा या फिर खानाबदोश संस्कृति जाति जनजाति कहलाते हैं। वह किस प्रकार के हैं तो लमन, लाम्बाडी और लंबाणी यह कुछ ऐसे समुदाय है जो राजस्थान मध्य प्रदेश झारखंड इन इलाकों में देखने के लिए मिलते हैं। ज्यादातर राजस्थान के अंदर में। जो खानाबदोश जनजाति कहलाती है।

इस प्रकार की जनजाति होती है जो सामान्य सामान्य जो जनजाति है जो जो लोग हैं, उनसे दूर व पिछड़ी रहती है। जंगल में रहती है। वह अपने आपको अलग महसूस करते है और अलग ही रहना पसंद करती है। यह ज्यादातर अगर आप भारत की बात करोगे तो उत्तरी भारत में मारवाड़ क्षेत्र में आंध्र प्रदेश तेलंगाना दक्षिण भारत में पाए जाते हैं।

मुख्य आबादी से विमुख –

जहां पर तात्पर्य जो लोग हैं जो पिछड़े हुए थोड़े ज्यादा है, वह अभी भी आगे नहीं आए जो मुख्य जनसंख्या आबादी है उसके साथ संपर्क में नहीं आये है। यह सारे उस तरह के खानाबदोश संस्कृति के लोग होते हैं। ये सामान्य लोग जैसे नही होते है। इनकी निर्भरता प्राकृतिक पर होती है। आज के समय में हम नौकरी या  सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं।

इन सब का इस तरह की चीज से दूर दूर तक संबंध नहीं होती है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक पर ही निर्भर रहते हैं। उसी से वह कमाते हो, उसी से खाते हैं, इस तरीके इनका जीवन यापन चलता है तो आज के समय में तो फिर भी बहुत हद तक क्या होता है। लोग पैसे पर निर्भर होने लगे हैं। खानाबदोश जो लोग हैं, वो भी अब पैसे की ओर भागने लगे।

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